मेघ आये सर्वेश्वर दयाल सक्शेना
मेघ आये सर्वेश्वर दयाल सक्शेना प्रस्तुत काव्यांश के माध्यम से कवि सर्वेश्वर दयाल सक्शेना ये कहना चाहते है की मेघ बहुत दिनों के बाद आया है पुरे तैयार होकर उसके स्वागत में उसके आगे आगे हवाए नाचती गति चल रही है और मेघ को देखने के लिए सभी लोग अपने घर के दरवाजे और खिडकिय खोलने लगे सभी गली और मुह्हलो के ऐसा प्रतीत होता है की जैसे कोई शहरी पाहून बड़े दिन बाद अपने शाशुराल को आये है मेघ रूपी मेहमान बड़े बन थान के और स्वर के आये है | प्रस्तुत काव्यांश के माध्यम से कवि सर्वेश्वर दयाल सक्शेना ये कहना चाहते है की मेघ रूपी मेहमान को देखने के लिए पेड़ डालियों को हिला हिला के देखने लगे अंधी और धूल मेहमान को देखने के लिए अपनी घाघरा उठा के भागी भागी आई , महान को अत हुआ देख कर नदिया ठिठक उठी और और सास की तरह अपनी घूँघट सरकने लगी | प्रस्तुत काव्यांश के माध्यम से कवि सर्वेश्वर दयाल सक्शेना ये कहना चाहते है की मेघ रूपी मेहमान बूढ़े पीपल के पेड़ ने आगे भाद कर अभिवादन किया क्योकि मेघ रूपी मेहमान बरसो बाद उनकी हाल चाल जानने को ए थे और लता रूपी साली पेड़ रूपी किदर की ओट (पीछे) से बेचैनी से बोलती ...